माँ

माँ ओ मेरी प्यारी माँ,

ममता की मूरत मेरी माँ,

जो कभी रव मुझे मिले,

ख्वाहिश मेरी मुझसे पूँछे,

बस तुझे हर जनम माँगू,

तेरी ही छाँव चाहूँ,

माँ ओ मेरी प्यारी माँ,

ममता की मूरत मेरी माँ,

रव का वरदान मेरी माँ,

चाहे दूर रहे या पास रहे,

हर वक्त तेरा ही ख्याल रहे,

कैसे भूल जाँऊ तुम्हें माँ,

रगों मे बहता खून तेरा ही,

माँ ओ मेरी प्यारी माँ,

ममता की मूरत मेरी माँ,

परछाई भी अगर साथ छोड़े,

पर माँ की दुआँ मेरे साथ रहे,

संतान का पालन करने को,

हर रुप धरा तुमने,

कभी दुर्गा ,काली बनी,

कभी सरस्वती,अन्नपूर्णा बनी,

माँ ओ मेरी प्यारी माँ,

ममता की मूरत मेरी माँ।

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नारी की कलम से।

मेरा सुकून भी तुम,
मेरा चैन भी तुम,
कहना चाहा और,
चाँहूगी तुमसे कहना,
कई बार,बार-बार,
सदियो से मैं बहे जा
रही निंरतर प्रवाह सी,
मधुर रसधार लिये,
तुम्हारे लिये जाने
कितने प्यार की
मधुर सौगात लिये,
पर जाने क्यों तुम
इतने गिले-शिकवे,
लिये रहते हो?
वंचित रह जाते हो
मेरे अथाह प्यार से,
सुनो कभी तो सुंकून
से भी सुनो, पल भर
को थमकर तो सुनो,
समझ पाओगे तुमसे,
मेरे अथाह प्यार को,
समर्पण को,बातों को,
चंचलता को और तुम्हें
देखकर मेरे चेहरे पर
खिलती मुस्कुराहट को,
पर जाने क्यों तुम
न थमते हो मेरे पास?
न रूबरू होते हो कभी?
मै फिर बहे जाती हूँ,
कभी मौन होकर,
कभी स्थिर होकर,
कभी शांत होकर,
कभी खफा होकर,
कभी उफनाकर,
कभी साहसी बनकर,
चट्टानों से टकराती,
अपने ही भवरों मे,
तरंगो मे उलझी हुई,
लेकिन हमेशा से,
तुम्हारी ही ओर,
कभी सरिता बन,
कभी झरना बन ,
बस अपनी मौजों मे,
अपनी ही सीमाओं मे
तुम्हारी संगिनी बनकर।

इम्तिहान

बचपन मे जब इम्तिहान,
दिया करते थे,
सुने हुये हर शब्दों को,
याद रखा करते थे,
अब जिंदगी के इम्तिहान,
दिया करते है,
मन को व्यथित करते,
कई शब्दों को अक्सर,
भूल जाया करते है,
मै कहूँ या न कहूँ,
पर हर इंसा जीवन मे,
शब्दों को अक्सर,
भूल जाया करते है,
रिश्तों को निभाने के लिये,
अपनो को पाने के लिये,
अक्सर सुने हुये शब्दों
को भूल जाया करते है,
जिन किताबों के सफे
भी याद हुआ करते थे,
इम्तिहान की तैयारी पर
खुश हुआ करते थे,
पर अब जिंदगी मे,
कई सफे यूँ ही बंद,
कर दिया करते है,
और खुश हुआ करते है,
मै कहूँ या न कहूँ,
हर इंसान जीवन मे ,
शब्दों को अक्सर,
भूल जाया करते है,
सचमुच जिंदगी के इम्तिहान
अजीब हुआ करते है,
सुने हुये शब्दों को भूलकर
ही अक्सर इम्तिहान
दिया करते है,
सच से जुड़े इम्तिहान
हुआ करते है।

गौरैयाँ बचाओ।

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जबसे गाँव शहर से हो गये,
मिट्टी के घर अब पक्के हो गये,
तबसे खेत-खलिहान,पंछी,
तलैयाँ सब भूले-बिसरे हो रहे,
रोज सुबह नजर आती गौरैयाँ,
हर मन को भाँ जाती गौरैयाँ,
सपनों सी हो रही चिरैयाँ,
खेत-खलिहानों मे घूँमती,
चूजों को दाना खिलाती,
बागों मे डाल-डाल इठलाती,
कभी बारिश मे भीगती,
कभी धूल से खेलती,
पर जाने अब कहाँ खो
रही गौरैयाँ,
घर-आँगन की रानी गौरैयाँ,
कभी जूठे बर्तनों से,
अम्मा के डाले दानों को,
रोज चुँगती नजर आती,
भूली-बिसरी हो रही गौरैयाँ,
सपनों सी हो रही चिरैयाँ,
बच्चों को लुभाती गौरैयाँ,
नन्हे हाथों से रोटी खाती,
सपनों सी हो रही चिरैयाँ,
आईने मे घंटों चोंच मारकर,
खुद से ही लड़ती गौरैयाँ,
अब भूली-बिसरी सी हो
रही गौरैयाँ,
दाना-पानी बिन,गरमी से,
रोज ही मर रही चिरैया,
विलुप्ती के कगार पर,
जा रही गौरैयाँ,
चंचल,चुलबुली सी गौरैयाँ।

सखियों को समर्पित

यूँ ही हँसती रहो,
मुस्कुराती रहो,
मुस्कुराहट ही तो
तुम्हारी साहस,
सौम्यता,उत्साह,
आत्मविश्वास,धैर्य,
का परिचायक है,
हजारों शब्दों मे भी
जो न कह सके,
बस सखी यही,
मुस्कुराहट ही तो,
नारी की ताकत है,
चमक उठे घर-द्वार,
जो हल्दी लगे हाथ,
छाप छोड़ गये,
प्यार से जो सीचीं
तुमने तुलसी क्यारी,
मंगल-कामना घर
के लिये है तुम्हारी,
तुम्हारे गजरा संग,
महकी आँगन की
फुलवारी,
हजार सपनों से जो
भरी रंगोली,
आगन भी यूँ दमके,
चाँद-सितारों संग,
और भी चमके,
पायल की छन-छन,
गूँज उठी किलकारी,
मुस्कुराओ सखी कि,
तुमसे ही तो है  घर-द्वार,
हजारों खुशियाँ न्योछावर,
जहाँ हो तुम्हारा संसार।

तिल गुड़ की मिठास

आओ यादों का पिटारा,
फिर खोल लेते है,
बचपन को फिर से,
याद कर लेते है,
तिल-गुड़ की मिठास,
और माँ के हाथो का,
स्वाद याद कर लेते है,
आओ यादो का पिटारा,
फिर से खोल लेते है,
ठिठुरती सी ठंड मे,
सुनहरी सी धूप मे,
उड़ाई हुई ,लपकी हुई,
पतंगो को फिर से,
याद कर लेते है,
वो जिंदगी मे मिठास,
घोलते हुए गड़िया गुल्ले,
साँचो मे ढले रंग-बिरंगे,
शक्कर के हाथी-घोड़े,
आज फिर से चख
लेते है,
यादो का पिटारा आज
फिर से खोल लेते है,
वो साँझा होती हुई,
टिफिन की मिठाईयाँ,
फिर से याद कर लेते है,
तिल-गुड़ की मिठास,
याद कर लेते है,
वो रौनक से भरे मेले ,
घूम लेते है,
पतंगो संग आसमां,
को छू लेते है,
खुशियों के खजाने
को लूट लेते है।

खामोशी

खामोशियाँ भी बातें
किया करती है,
जुबाँ पर शब्द भले
न हो,
अपनों से बातें भले
न हो,
पर खुद से ही बातें
होती है ,
और यूँ तो मै बहुत,
बातें किया करती हूँ,
पर कभी-कभी,
खामोश भी रहा ,
करती हूँ,
कभी-कभी खुद से,
भी जो मिला करती हूँ,
मेरी खामोशियाँ भी,
मुझे कभी-कभी भाँ
जाती है,
मुझे मेरे करीब जो,
लाती है,
जब कभी खुशी या
गम हो,
अंर्तमन मे द्वन्द हो,
अनसुलझे से प्रश्न हो,
या फिर खोजनी
अपनी खामियाँ हो,
हाँ मै भी खामोश हो
जाया करती हूँ,
अपने लिये भी जियाँ
करती हूँ,
और जब भी टूटती
है खामोशियाँ,
पाती हूँ नई उर्जा,
उत्साह, मुस्कुराहट,
फिर से इक बार।