नारी की कलम से।

मेरा सुकून भी तुम,
मेरा चैन भी तुम,
कहना चाहा और,
चाँहूगी तुमसे कहना,
कई बार,बार-बार,
सदियो से मैं बहे जा
रही निंरतर प्रवाह सी,
मधुर रसधार लिये,
तुम्हारे लिये जाने
कितने प्यार की
मधुर सौगात लिये,
पर जाने क्यों तुम
इतने गिले-शिकवे,
लिये रहते हो?
वंचित रह जाते हो
मेरे अथाह प्यार से,
सुनो कभी तो सुंकून
से भी सुनो, पल भर
को थमकर तो सुनो,
समझ पाओगे तुमसे,
मेरे अथाह प्यार को,
समर्पण को,बातों को,
चंचलता को और तुम्हें
देखकर मेरे चेहरे पर
खिलती मुस्कुराहट को,
पर जाने क्यों तुम
न थमते हो मेरे पास?
न रूबरू होते हो कभी?
मै फिर बहे जाती हूँ,
कभी मौन होकर,
कभी स्थिर होकर,
कभी शांत होकर,
कभी खफा होकर,
कभी उफनाकर,
कभी साहसी बनकर,
चट्टानों से टकराती,
अपने ही भवरों मे,
तरंगो मे उलझी हुई,
लेकिन हमेशा से,
तुम्हारी ही ओर,
कभी सरिता बन,
कभी झरना बन ,
बस अपनी मौजों मे,
अपनी ही सीमाओं मे
तुम्हारी संगिनी बनकर।

Advertisements

14 thoughts on “नारी की कलम से।

  1. कभी साहसी बनकर,
    चट्टानों से टकराती,
    अपने ही बबंडरो मे,
    तरंगो मे उलझी हुई,

    उत्तम अति उत्तम ,रचना 👍👍👍👍 दिल को छू गयी 👌

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s