गौरैयाँ बचाओ।

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जबसे गाँव शहर से हो गये,
मिट्टी के घर अब पक्के हो गये,
तबसे खेत-खलिहान,पंछी,
तलैयाँ सब भूले-बिसरे हो रहे,
रोज सुबह नजर आती गौरैयाँ,
हर मन को भाँ जाती गौरैयाँ,
सपनों सी हो रही चिरैयाँ,
खेत-खलिहानों मे घूँमती,
चूजों को दाना खिलाती,
बागों मे डाल-डाल इठलाती,
कभी बारिश मे भीगती,
कभी धूल से खेलती,
पर जाने अब कहाँ खो
रही गौरैयाँ,
घर-आँगन की रानी गौरैयाँ,
कभी जूठे बर्तनों से,
अम्मा के डाले दानों को,
रोज चुँगती नजर आती,
भूली-बिसरी हो रही गौरैयाँ,
सपनों सी हो रही चिरैयाँ,
बच्चों को लुभाती गौरैयाँ,
नन्हे हाथों से रोटी खाती,
सपनों सी हो रही चिरैयाँ,
आईने मे घंटों चोंच मारकर,
खुद से ही लड़ती गौरैयाँ,
अब भूली-बिसरी सी हो
रही गौरैयाँ,
दाना-पानी बिन,गरमी से,
रोज ही मर रही चिरैया,
विलुप्ती के कगार पर,
जा रही गौरैयाँ,
चंचल,चुलबुली सी गौरैयाँ।

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12 Comments

  1. बिलकुल हमें याद है बचपन में हमारे छत पर गिलहरीयों और गौरैयों का आना जाना लगा रहता था । अब नाम मात्र की गिलहरीयाँ ही यदा कदा दिखाई देती हैं, गौरैया तो कब की गायब हो गई शहरों से ।

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