आज फिर

आ चल आज फिर,
भीग चले बारिश मे,
मौसम तो आयेंगे,
फिर चले जायेंगे,
कभी बारिश होगी,
कभी तपिश होगी,
पर फिर भी जिंदगी,
तेरे संग ही होगी,
चलो इक बार फिर,
भीग चले बारिश मे,
मानाकि मै थी रुठी,
पर तुम भी तो थे ,
मुझसे कुछ रुठे से,
आ चल आज फिर,
भीग चले बारिश मे,
न तुम कुछ कहो,
न हम कुछ कहे,
न हो गिले-शिकवे,
बस भीग जाये,
इक बार फिर,
संग-संग बारिश मे,
प्यार की बारिश मे,
आ चल आज फिर ,
भीग चले बारिश मे,
नाता तो गहरा है,
मेरा तुझसे,
मगर फिर भी,
क्या पता कि कही,
फिर रुठ न जाँऊ,
आ चल आज फिर ,
भीग चले बस,
संग-संग बारिश मे।

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14 thoughts on “आज फिर

  1. ब्रश में भीगने का अपना ही मज़ा होता है और फिर कोई मनचाहा साथ हो तो कहने ही क्या!
    बहुत खूब शालीनिजी.

    Liked by 1 person

  2. Haii…
    This is first time I m reading your blog.
    I want to share something…
    You know I love someone and she also loves rain and every time she get to rain she use to text me to come with her and we jell through our imaginations.
    Her name is also Shalinee..

    Your name, your poem did something to me…
    Thank you for the creation

    Liked by 1 person

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