श्रद्धांजलि(शहीदों और उनके परिवार को समर्पित)

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आज कलम भी रोकर,
मुझसे बोल पड़ी ,
स्याही की जगह आँसुओं
से भर दो मुझे,
नमन करना चाहती हूँ,
मै भी शहादत को,
आज कलम भी रोकर,
मुझसे बोल पड़ी,
जंग तो मैने नही देखी,
पर जो शहीद हुए,
उन्हें श्रद्धांजलि देना
चाहती हूँ,
आज कलम भी रोकर,
मुझसे बोल पड़ी,
लिखना चाहती हूँ उन,
आँखों के आँसुओं को,
जो जागेगी अब उम्र भर,
कभी बेटों की यादों मे,
कभी भाई की यादों मे,
कभी पति की यादों मे,
आज कलम भी रोकर,
मुझसे बोल पड़ी,
बयाँ करना चाहती हूँ,
मंजर-ए-जंग को,
मंजर-ए-नफरत को,
बिछड़ती इंसानियत को,
उन उजड़े हुए गाँव को,
खून से लथपथ,
खेत और गलियों को,
आज कलम भी रोकर,
मुझसे बोल पड़ी,
महसूस कर सकती हूँ,
अनाथ-मासूम बच्चों के,
के आँसुओं को,
सरहद पर हुई जंग को,
आज कलम भी रोकर,
मुझसे बोल पड़ी।
स्याही की जगह,
आँसुओं से भर दो मुझे।
बयाँ करना चाहती हूँ,
बहते लहू को देख,
पथराई धरती माँ को,
कलम है मेरी आज,
आँसुओं से लिखती
हुई।

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