हुनर

हँसती,खिलखिलाती,
गुनगुनाती है,
अरमानो के पंख,
लिये उड़ जाती है,
और फिर सँवरती है,
सँवरकर फिर बिखर
जाती है,
जाने ये हुनर कब
सीख जाती है,
जाने क्यों अनबुझी सी,
पहेली बन जाती है,
जाने ये हुनर कब,
सीख जाती है,
हजारों सपने सजोती है,
जीवन की खूबसूरत सी,
तस्वीर बनाती है,
जाने फिर खुद क्यों,
बेरंग सी हो जाती है,
जाने क्यों अनबुझी सी,
पहेली बन जाती है,
खूबसूरत से घरौदे
बनाती है,
और वो रेत सी बिखर
जाती है,
जाने ये हुनर कब,
सीख जाती है,
तुम करती क्या हो?
और जाने कितने
सवाल अनुत्तरित
कर जाती है,
सच तो है न वक्त
है खुद के लिये,
जाने क्यों वक्त,
सारा अपनो के
लिये बिताती है,
रचती है घर-संसार,
सिखाकर जीना सभी
को खुद जीना कब
भूल जाती है,
जाने ये हुनर कब
सीख जाती है,
ताउम्र हँसते-मुस्कुराते,
जाने क्यों चुपके से,
रोना सीख जाती है,
जाने क्यों और कब,
सँवारने के लिये घर,
खुद ही बिखर जाती है।
जाने ये हुनर खुद
बिखरने का कब,
सीख जाती है।

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