भाव

इक थी मैया,
बाल-गोपाल की पुजारिन,
हल्वा-पूरी का भोग लगाती,
प्रभु भक्ति मे रहती थी डूबी,
इक बार मैया थी उदास,
कुछ बाल गोपाल से रुठी,
पूजन मे बैठी उदास,
माँखन-मिश्री का भोग
लगाया,
और अगले दिन क्या हुआ?
मैया का बालक करे पुकार,
आज तो मैया पूरी खाऊगाँ,
पूरी बनने पर वह बोला,
मैया छोटी पूरी खाऊँगा,
मैया फिर से रुठ गई,
पर बाल-हठ से हार गई,
पूरी बनने पर बालक बोला,
मैया प्रभु को भोग लगाओ,
मैया को फिर सुध आयी,
भाव से बनाती थी हल्वा
और पूरी,
हल्वा-पूरी बिना भूँखे थे
हरि भी,
बालक बन करें पुकार,
हल्वा-पूरी की,
अश्रु-धार मे मैया डूबी,
गहन विचारों मे थी डूबी,
क्यों करता है मानव चिंता
कल की,
प्रभु को है खबर हर मानव
के हर पल की,
जब-जब मानव पर विपदा
आती,
सच्चे दिल से करो पुकार,
स्वयं चले आते है जग
के पालनहार।

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