ईश्वर के उपहार

मूर्तियाँ भी शिल्पकार की,
आभारी होती होगी,
उसके तराशने के उद्देश्य,
को जो समझती होगी,
ईश्वर भी शिल्पकार की
तरह,
सहृदयता,आत्मीयता,
और निःस्वार्थ प्रेम का
वरदान देकर,
सृष्टि की हर कृति को,
तराशता,
निःस्वार्थ प्रेम का सभी
को अनमोल उपहार
देती है कुदरत,
कल-कल बहते झरने,
प्यास बुझाती नदियाँ,
आँखों को सुँकून देती
हरियाली,
रोशनी देते सूरज,चाँद,
और सितारे,
इक और उपहार हमें,
खूबसूरत आत्मा का
वरदान,
दुख-सुख से और भी
निखरती आत्मा,
बचपन की दहलीज से
मिलती खुशियाँ,
हाथ बंदकर थामी हुई
खुशियाँ,
निःस्वार्थ बँटती हुई
मुस्कुराहट,
और हथेलियाँ खोली भी,
तो बारिश की बूंदों सी,
मोती बिखेरती खुशियाँ,
टूट कर जुड़े हुए खिलौने
सी सवँरती आत्मा,
स्वयं प्रकाशित होकर,
खुशियाँ, शांति और
प्रकाश फैलाती आत्मा,
खोने और पाने से परे,
जिंदगी के हर लम्हों को,
खूबसूरती से जीती आत्मा,
निःस्वार्थ प्रेम करती हुई
आत्मा,
सचमुच वरदान होती है
ईश्वर का,
सहृदयता से परिपूर्ण
आत्मा।

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