रुहानी खत

सम्भाल रखे है अब भी,
रुहानी से खत,
ढलके हुए मोतियों ने,
बेशकीमती कर दिया,
भूला-बिसरा सा,
खत का दौर अब कहाँ,
रुह से जुड़े हुए थे सब,
खाली बरक भी बोल
पड़ते थे तब,
मायूस से चेहरे दर्पण,
से जो झलकते थे,
खामोश लफ्ज कहते थे,
कुछ अनकही कहानियां,
बस भूला -बिसरा सा,
खत का दौर अब कहाँ,
टूटे-फूटे लफ्जो को भी,
पड़ लेते थे,
माँ की उदास आँखों के,
आँसू जो बरसते थे,
वो खत का दौर अब कहाँ,
इक पाती जो मुहल्ले में ,
आती थी,
डाकिये की आवाज से,
घरों के द्वार खोल जाती थी,
सांझा होते थे सुख-दुख,
वो खत का दौर कहाँ,
वो जज्बातों से भरे,
वो खत मिलते अब कहाँ,
ख्यालों मे ढले सुनहरे ,
अल्फाज अब स्याही मे,
डूबते कहाँ,
फाँसले तो अब भी ,
नजदीकियों मे तब्दील
होते है,
सुख-दुख अब भी बयाँ
होते है,
पर गीली सी स्याही ,
लफ्जो को रुहानी,
अहसासो मे तब्दील करे,
रुहानियत से भरे खत,
मिलते है अब कहाँ,
रंगबिरंगी सी पातियाँ,
बँधी है स्नेह के डोर से,
पीहर को भूल जाना,
चाहती है कहाँ,
कुछ हसरते अब भी
बाकी है,
खत के दौर को जारी
रखने की चाहत,
कभी-कभी जज्बातो मे
अब भी झलकती है यहाँ।

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