महक

कल भी,
न थमने वाले ,
याँदो के सिलसिले,
रुबरू थे मुझसे,
थमी हुई बारिश,
हवा की सौधीं महक,
और सुहाने से मौसम मे,
बस मेरे चलते हुए कदम,
हरियाली भरा रास्ता,
सिके हुए भुट्टो की खुशबू,
और फिर याँदो के झरोखे,
बारिश, बचपन और
घर मे महकते पकवान,
खुशबे से भरे पकौड़े,
चीले ,गुलगुले और
सिगड़ी की मध्यम आँच
मे सिके हुए भुट्टो को
संग बैठकर खाना,
बूंदों के हर्षोल्लास
संग मैने भी बनाये
कुछ पकवान,
खोज रही थी खुशबू,
मै बचपन वाली,
मेरे माँ के हाथों की,
खाने को लजीज जो
बनाना था।

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